आधी रात को भिक्षु किसी चीज़ को धार देने की आवाज़ से जागा। उसने दीवार के छेद से बगल वाले कमरे में झाँका और देखा कि वह दयालु बूढ़ी औरत डायन बन चुकी थी और चाकू तेज़ कर रही थी। "निश्चय ही वह मुझे खाने वाली है," उसने सोचा।
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"दादी, दादी, मुझे शौचालय जाना है," भिक्षु ने कहा। डायन बोली, "ठीक है, पर रास्ता न भूलो, इसलिए मैं यह रस्सी तुम्हारी कमर से बाँध दूँगी।" उसने उसे रस्सी से बाँध दिया।
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"दादी, दादी, मुझे शौचालय जाना है," भिक्षु ने कहा। डायन बोली, "ठीक है, पर रास्ता न भूलो, इसलिए मैं यह रस्सी तुम्हारी कमर से बाँध दूँगी।" उसने उसे रस्सी से बाँध दिया।